विशेष रिपोर्ट
बिहार में शराबबंदी को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी कानून पर अब सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों से सवाल उठने लगे हैं। हाल के बयानों के बाद यह मुद्दा फिर से राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में आ गया है।
20 हजार करोड़ नुकसान का दावा
कुछ नेताओं का दावा है कि शराबबंदी के कारण राज्य को भारी राजस्व नुकसान उठाना पड़ रहा है। राजनीतिक मंचों पर “करीब 20 हजार करोड़ रुपये तक के संभावित नुकसान” की बात कही जा रही है। हालांकि, इस आंकड़े पर सरकार की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी लागू होने के बाद उत्पाद राजस्व में कमी आई है, लेकिन सरकार का तर्क रहा है कि सामाजिक लाभ आर्थिक नुकसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
बयानों से बढ़ी राजनीतिक हलचल
शराबबंदी की समीक्षा की मांग पहले भी उठती रही है। हाल में कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कानून में बदलाव या पुनर्विचार की बात कही है। इसके बाद अन्य राजनीतिक खेमों से भी आवाजें आने लगी हैं कि राज्य सरकार को नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।
वहीं, सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि शराबबंदी महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों के हित में लिया गया ऐतिहासिक फैसला है और इसे वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता।
कानून की पृष्ठभूमि
बिहार में पूर्ण शराबबंदी अप्रैल 2016 में लागू की गई थी। सरकार का कहना रहा है कि इससे घरेलू हिंसा में कमी आई और सामाजिक माहौल बेहतर हुआ। हालांकि, विपक्ष लगातार इसके क्रियान्वयन और कथित अवैध कारोबार को लेकर सवाल उठाता रहा है।
आगे क्या?
फिलहाल यह बहस राजनीतिक स्तर पर जारी है। सरकार की ओर से कानून खत्म करने को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। आने वाले दिनों में यदि दबाव बढ़ता है तो नीति की समीक्षा पर चर्चा हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला सरकार के स्तर पर ही होगा।
बिहार की राजनीति में यह मुद्दा आगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा भी बन सकता है।

